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संतानहीनता का इलाज

प्राचीन समय से इस सभ्य समाज ने जो स्त्री-पुरूष के विवाह-बंधन की व्यवस्था की थी उसका प्रमुख उद्देश्य यही है कि प्रत्येक स्त्री-पुरूष मिलकर संतान उत्पन्न करें और अपना वंश आगे बढ़ायें। कुदरत के जीवन-मरण नियम के आधार पर भी संतान उत्पन्न होना जरूरी है क्योंकि संतान न होने पर सारा संसार चक्र ही ठहर जायेगा। हिन्दु धर्म के ग्रन्थों में तो यह भी लिखा है कि मनुष्य की मृत्यु होने पर उसे अग्नि देने, कपाल क्रिया करने व श्राद्ध तर्पण करने के लिए संतान के रूप मंे पुत्र का होना जरूरी है अन्यथा मृत व्यक्ति की आत्मा को शान्ति नहीं मिलेगी। इसी तरह से परिवार में संतान के रूप में पुत्री का होना माना गया है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि बिना कन्यादान किए स्त्री-पुरूष को मोक्ष प्राप्त नहीं होता। अब पुरानी मान्यताएं चाहें कुछ भी हो लेकिन प्रकृति का ताल-मेल बनाए रखने के लिए संतान के रूप में लड़का व लड़की होना बहुत आवश्यक है जो आगे चलकर पुरूष-स्त्री का दायित्व निभाते हुए इस संसार चक्र को आगे बढ़ाते रहें। दुर्भाग्यवश कुछ स्त्री-पुरूष इस चक्र को चलाने वाली एवं उनकी वंश बेल आगे बढ़ाने वाली संतान से वंचित रहते हैं और बच्चे के लिए तरसते हैं। बहुत से स्त्री-पुरूष संतान सुख के लिए बिलकुल विवेकहीन हो जाते हैं। उनकी बस एक ही इच्छा या धुन रहती है कि किसी तरह से संतान उत्पन्न हो जाये। ऐसी अज्ञानतावश वे किसी भी व्यक्ति के कहने पर साधू-सन्तों, पीर-फकीरों और ताबीज गंडे करने वाले सयानों के पास चले जाते हैं। वहां उन्हें कुछ ठग जो साधू-सन्तों, पीर-फकीरों के वेश में होते हैं। वहीं अपने चक्कर में फंसा कर उनसे काफी धन लूट लेते हैं जिससे बहुत से निःसंतान स्त्री-पुरूषों का धन व समय व्यर्थ में बर्बाद हो जाता है। यह बात हम भी स्वीकार करते हैं कि संतान न होना एक चिन्ता का विषय है, लेकिन इसमें कुदरत के दोष से ज्यादा स्त्री-पुरूष का शारीरिक दोष जिम्मेदार होता है।
आज का विज्ञान बहुत आगे बढ़ गया है और अपनी खोज और अनुसंधान के बल पर परख नली शिशु का जन्म तक कर दिया है। समझदार स्त्री-पुरूष को चाहिए कि यदि उन्हें संतान नहीं हो रही है तो अपने शारीरिक दोषों की भली भांति जांच कराकर दोषी अंगों की उचित चिकित्सा करा लें क्योंकि शारीरिक अंगों के दोष गंडें-ताबीजों या पीर-फकीरों द्वारा दी गई राख से दूर नहीं होते। आज यह बात तो सबको मालूम है कि संतान का जन्म वीर्य में उत्पन्न शुक्राणुओं की शक्ति तथा दोष रहित गर्भाशय द्वारा ही होता है। स्त्रियों में जो दोष होते हैं उनमें ज्यादातर मासिक की गड़बड़ी का होता है जो थोड़े से इलाज द्वारा पूरी तरह से ठीक हो जाता है। केवल एक प्रतिशत स्त्रियों में फैलोपियन टयूब बन्द होने की शिकायत पाई जाती है जिसमें 50 प्रतिशत स्त्रियों का आप्रेशन होकर एक तरफ का रास्ता खुल जाता है। जिससे वे गर्भधारण करने में सक्षम हो जाती हैं। लेकिन पुरूषों में अधिकांश दोष पाया जाता है क्योंकि उनके वीर्य में या तो शुक्राणु बिलकुल नहीं होते या फिर बहुत कम मात्रा में होते हैं। यदि किसी के वीर्य में शुक्राणु स्त्री के गर्भ तक नहीं पहुंच पाते, जिससे स्त्री को कोई दोष नहीं होता। यदि दोष होता है तो पुरूष के वीर्य का होता है जो वह अपनी कारगुजारियों से पहले ही पतला व बेजान बना चुके होते है। ध्यान रहें, शुक्राणुओं का निर्माण पुष्ट व गाढ़े तथा निर्दोष वीर्य से ही होता है और ऐसे वीर्य में ही शुक्राणु अधिक मात्रा में विकसित होकर तेजगति से चलने वाले क्रियाशील बनते हैं तो पुरूष द्वारा किए गए सहवास द्वारा पहले ही प्रयास में अपनी मंजिल स्त्री के डिंब में जा मिलते है। जिसके फलस्वरूप स्त्री गर्भवती होकर स्वस्थ व सुन्दर बच्चे को जन्म देती हैं हमारा फर्ज संतानहीन पुरूषों को सचेत करके उन्हें सही सलाह देना है। यदि दुर्भाग्यवश आप या आपका मित्र अथवा परिचित रिश्तेदारों में कोई स्त्री पुरूष संतान न होने के कारण परेशान है तो वे पूरे विश्वास के साथ पति-पत्नी दोनों हमसे हमारे क्लिनिक में मिलंे या अपना हमदर्द समझते हुए हमें पत्र अवश्य लिखें हम उनके सारी हालत, जानकर, समझकर सही-सटीक पूर्ण लाभकारी इलाज देंगे ताकि उनके घर के सूने आंगन में भी बच्चे की किलकारियां गूंज सकें।

शुक्राणुओं की कमी

कई पुरूषों को यौन संबंधी कोई रोग नहीं होता तथा सहवास के समय उनके लिंग में उत्तेजना व तनाव भी सामान्य व्यक्ति जैसा ही होता है। संभोग शक्ति भी पूर्ण होती है किन्तु उनके वीर्य में संतान उत्पन्न करने वाले शुक्राणु या तो बिल्कुल ही नहीं होते या बहुत ही कमजोर एवं मंद गति से चलने वाले होते हैं। जिससे पुरूष संतान उत्पन्न करने योग्य नहीं रहता। ऐसे रोगी के लिए आयुर्वेदिक एवं शक्तिशाली औषधि द्वारा तैयार इलाज सबसे बेहतर माना जाता है। हमारे ऐसे ही इलाज से असंख्य रोगी जो निराश होकर संतान पैदा करने की चाहत ही मन से निकाल चुके थे। उन सभी रोगियों का वीर्य पूरी तरह से निरोग व क्रियाशील शुक्राणुओं से परिपूर्ण हो चुका है और अब वे संतान पैदा करने योग्य बन चुके हैं।

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  • आयुर्वेदाचार्य हिन्दी स्वास्थ पत्रिका ‘‘चेतन अनमोल सुख’’ के संपादक भी है
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